Apr 24, 2011
तेरा सपना
Apr 8, 2011
सफ़र और मंजिल
बहुत दूर आ चुका है अब इंसान
हैरत है होती अब कि मंज़िल कहाँ थी
चाँद पर कदम जमाये तो एक अर्सा गुज़र गया
ख्याल भी नहीं अब कि ज़मीन कहाँ थी
अपने हालातों को मजबूरियों का नाम दे दिया
याद नहीं आता है अब कि चाहत क्या थी
मुल्क और मज़हब का नुमा इन्दा बना है हर शख्स
इन लोगों की भीड़ में इंसानियत कहाँ थी
काश की कभी रुक कर सफ़र पर सोचा होता
पर इस अंधी दौड़ में इतनी सी भी फुर्सत कहाँ थी
Feb 2, 2011
तब मंदिर बने
एक दिन यूँ ही भावनाओं में बहकर मैं
उसको वहां से अपने साथ ले आया
सोचा था बस जाएगा वो भी साथ हमारे
जैसे कितने ही रिवाजों ने है घर बनाया
पर देखकर इस दुनिया की दुनियादारी
वो कुछ इस तरह से तिलमिलाया
की मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया
पहले पहल तो हर किसी ने उसे अपनाया
उसकी बातें सुनकर तारीफों का पुल भी बनाया
पर जब चलने की बात की उसने दिखाई राह पर
सबने उसे भटका हुआ राही बुलाया
बस इसीलिए मैंने एक मंदिर बनाया
सब जानते थे की उसकी पहचान क्या है
सब जानते थे की उसका पैगाम सच्चा है
पर भीड़ के सामने कोई आवाज़ न उठा पाया
इसीलिए मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया
Nov 20, 2010
एक और ख्वाब
Sep 17, 2010
गीत की तलाश
इस भारी से लम्हे का बोझ कुछ कम करने के लिए
मैं एक गीत की तलाश में कहाँ कहाँ न गया ...
कुछ अतीत की गलियाँ छानी,
जहाँ बस बीते यादों की धूल मिली
कुछ सपनो की बुनी कहानी,
जो किसी मरीचिका सी दूर रही
कभी प्रीत की डोर भी थामी
पर वो भी कुछ कमज़ोर रही
मंदिर देखे, किताबें ढूंढी,
पर निशाँ न था उसका कहीं
जब एक दिन थक हार कर बैठा
और अपने उसी खाली से मन को देखा
तो उसकी ही गहराइयों में कहीं
इसी लम्हे की गोद में बस वहीं
हर खालीपन को भरता हुआ
हर बोझ को कम करता हुआ
हर नज़र से अनदेखा हुआ
वो गीत हमेशा यहीं था
वो गीत हमेशा यहीं था ...