Friday 8 January 2010

मैं जानता हूँ, पर ...


मैं जानता हूँ की ये सफ़र हमारा साथ कहीं छुड़ा देगा,

पर दिल क्यूँ चाहता है की तुम दो कदम साथ चलो?

मैं जानता हूँ सुबह का सूरज मुझे नींद से जगा देगा,

पर दिल क्यूँ चाहता है तुम इन आँखों में रात करो?

मैं जानता हूँ की प्यासा ही रह जाऊंगा मैं शायद,

पर दिल क्यूँ चाहता है तुम मेरी बरसात बनो?

मैं जानता हूँ अंत नहीं कोई इस सिलसिले का,

पर दिल क्यूँ चाहता है तुम इसकी शुरुआत करो...

Thursday 31 December 2009

The last post of the year

This is formally the last post of the year by me on this blog. The year 2009 ends today and my twitter status reads, "another year of failed resolutions, unkept promises about to end, and not as one has ended another is ready to follow. Happy New Year." Someone asked me that why so negative towards the end of the year. All I have to say is that to me it is not a negative attitude to remember one's failures or shortcomings. What I have achieved is something that is in the past but what I failed to achieve has implications for the future. It means I have unlearnt lessons, opportunities to improve and things that are still to be done. Isn't that the whole message the new year is supposed to bring?
Maybe I am wrong. Your comments are welcome and yes once again, Happy New Year.

Wednesday 2 December 2009

न जाने क्यूँ

न जाने क्यूँ
छू न पाना चाँद को
उसकी खूबसूरती को बढ़ा जाता है,
कह न पाना उस बात को
उसकी एहमियत को जता जाता है,
और न जाने क्यूँ
मिलना तुमसे दो पल का,
दूरियों का एहसास दिला जाता है

Saturday 19 September 2009

आज़ादी


तुमने हमेशा लम्हों को यादों की ज़ंजीरों से बांधना चाहा
हर सपने को हकीक़त की सीमाओं में क़ैद किया
खूबसूरती को तस्वीरों में छुपाने की कोशिशें की
और अपने इर्द-गिर्द अपनी ही चाहत का किला बनाया,
और आज तुम आज़ादी की बात करते हो?
ये बिन जाने,
कि जिन बन्धनों में बाँध रहे हो तुम
ख़ुद उनमें उलझते से जा रहे हो ...

Thursday 3 September 2009

एक सवाल


ऐसा क्यों होता है कभी कभी कि

बातें शब्दों के जाल में उलझकर रह जाती हैं,

इरादे कोशिश के दायरे से निकल कर हकीकत को नही छू पाते हैं

सुबहें पलकों के परदों को पार कर आंखों से नही मिलती,

और आवाजें इन कानों को चीर कर दिल तक नही पहुँचती

क्यों हम खुली आंखों से सच को झुठलाते हैं और,

अपनी हालत का जिम्मेदार हालात को ठहराते हैं?



Thursday 9 July 2009

उड़ान

आज बंद करके आँखें,
जो आकाश को देखा
तो कितने ही आज़ाद पंछी दिखे
उड़ते हुए एक ऐसी उड़ान,
जिसका न कोई अंत था और न कोई शुरुआत,
न कोई क़दमों के निशाँ थे आसमान पर,
जिनपर उनको चलना पड़ता
न थी उम्मीद की बेडियाँ,
जो बांधती हो उनको लोगों के सपनों से

बस आज़ादी थी और,
उनकी अपनी उड़ान
जो कहीं से मुझे कुछ इशारा सा करती थी

पर जब आँख खुली,
तो शाम ढल चुकी थी
और आसमान खाली था
मैं वहीँ ज़मीन पर,
अपने परों से अनजान
भीड़ में खोता जा रहा था ...

Thursday 25 June 2009

मुड़ कर न देखना


वक़्त के इशारे पे,

नदी के इस किनारे से,

रुख़सत तो पड़ रहा है तुम्हे करना

बस इतनी सी गुज़ारिश है मेरे दोस्त

इस तरफ़ मुड़ कर न देखना


जाते हुए क़दमों की आहट को मैं सुन लूँगा

चुप चाप शायद रो भी लूँ,

पर कुछ न कहूँगा

पर अपनी आंखों में आए तूफ़ान से,

मेरे सब्र के बाँध की ताक़त को न परखना

बस इसीलिए गुज़ारिश है मेरे दोस्त

अब कभी मुड़ कर न देखना