मैं तुम्हे कभी बस तस्वीरों से जानता था
देखता था तुमको और तुम्हारे रंगों पर आश्चर्य करता था
कि क्या हकीकत तस्वीरों के सपनों जैसी हो सकती है?
फिर एक दिन तुम हकीकत बन गए
और तुमसे मिलकर जाना कि तस्वीरें कितनी अधूरी हैं
उजाले और अंधेरों के कितने रंग हैं
जो इनमें समा ही नहीं सकते
और अब मुझे खुद से मिलाकर
थोड़ा सा जिंदगी का एहसास कराकर तुम
फिर उन्ही तस्वीरों में गुम होने वाले हो
तस्वीरों से तस्वीरों तक का सफर भी कितना खूबसूरत और अजीब होता है...

