Wednesday 22 February 2012

तस्वीरें

Almost two amazing years at XL are about to end. Saw the Learning Center in the evening today and was reminded of a pic of the same in the admissions brochure. This poem is dedicated to the awesome place called XLRI.

मैं तुम्हे कभी बस तस्वीरों से जानता था
देखता था तुमको और तुम्हारे रंगों पर आश्चर्य करता था
कि क्या हकीकत तस्वीरों के सपनों जैसी हो सकती है?

फिर एक दिन तुम हकीकत बन गए
और तुमसे मिलकर जाना कि तस्वीरें कितनी अधूरी हैं
उजाले और अंधेरों के कितने रंग हैं
जो इनमें समा ही नहीं सकते

और अब मुझे खुद से मिलाकर
थोड़ा सा जिंदगी का एहसास कराकर तुम
फिर उन्ही तस्वीरों में गुम होने वाले हो
तस्वीरों से तस्वीरों तक का सफर भी कितना खूबसूरत और अजीब होता है...

Saturday 3 December 2011

तुम कौन हो ?

बाहें फैलाए मिलने वाले सूरज के जैसे,
मेरे दिन रोशन कर जाया करते थे
अब ढलती शाम के ओझल होते दिन के जैसे
थोडा सा अँधेरा इस कमरे में भर जाते हो

दौड से हांफती इस जिंदगी में साँसों के जैसे
मेरे सीने में भर जाया करते थे
अब टूटते जिस्म की आखिरी श्वासों के जैसे
थोडा सा मुझे अकेला कर जाते हो

महफ़िल में गूंजने वाले बोलों के जैसे
मेरे होंठों पर सज जाया करते थे
अब किसी भूले हुए गीत के लफ़्ज़ों के जैसे
थोडा सा यादों से खोते जाते हो

अब मैं क्या कहूँ तुमसे की तुम कौन हो
कल तुम मेरे गीत थे
अब तुम मेरे मौन हो ..

Sunday 2 October 2011

बस कुछ यूँ ही

चाँद बनने की तमन्ना भी रखते हैं
और धब्बों से परहेज़ भी करते हैं
आसमान छूने की ख्वाहिश भी रखते हैं
और आँखों में सूरज का खौफ़ भी करते हैं
कुछ अजीब ही हैं तेरे शहर के लोग, ए यार
शोर को इज़हार समझते हैं और,
ख़ामोशी नज़रअंदाज़ करते हैं...

Saturday 7 May 2011

The days

Written for the climax of a short film on college life.

ओस की एक बूँद एक रात अनजाने में एक पत्ते से मिल गयी
और जिसको पड़ाव समझा था वो शेह ज़िन्दगी सी बन गयी
अब तो ये भी होश नहीं की उस मोड़ के बाद ज़िन्दगी किधर गयी
एक गीत , एक हंसी और कुछ धुआं बनकर शायद हवाओं में बिखर गयी
ए दोस्त तेरे साथ , और उसकी एक हंसी से लगा सारी उलझने सुलझ गयी
चल पड़ा था जिनपर यूँ ही , वो र|हें मंजिल सी बन गयी
पर अब ये सफ़र ख़त्म होने को है
राह का मुसाफिर अपनी मंजिल पाने को है
पर जो बातें यादें बनकर इन लम्हों में गुज़र गयीं
शायद वही जीने के एहसास को पूरा कर गयीं

Sunday 24 April 2011

तेरा सपना

कुछ अधूरा सा, कुछ अपना सा
तेरा सपना कल रात, इन आँखों में सिमट गया
रात की तरह ही ये मन भी अँधेरे में था
एक जुगनू की तरह वो मुझमें चमक गया
अब भला इस खूबसूरत मुलाक़ात को मैं ख्वाब कैसे कहूँ?
जब एक अनकहे पल में तू मेरी हकीकत बन गया …

Friday 8 April 2011

सफ़र और मंजिल

बहुत दूर आ चुका है अब इंसान
हैरत है होती अब कि मंज़िल कहाँ थी

चाँद पर कदम जमाये तो एक अर्सा गुज़र गया
ख्याल भी नहीं अब कि ज़मीन कहाँ थी

अपने हालातों को मजबूरियों का नाम दे दिया
याद नहीं आता है अब कि चाहत क्या थी

मुल्क और मज़हब का नुमा इन्दा बना है हर शख्स
इन लोगों की भीड़ में इंसानियत कहाँ थी

काश की कभी रुक कर सफ़र पर सोचा होता
पर इस अंधी दौड़ में इतनी सी भी फुर्सत कहाँ थी

Wednesday 2 February 2011

तब मंदिर बने

एक दिन यूँ ही भावनाओं में बहकर मैं

उसको वहां से अपने साथ ले आया

सोचा था बस जाएगा वो भी साथ हमारे

जैसे कितने ही रिवाजों ने है घर बनाया

पर देखकर इस दुनिया की दुनियादारी

वो कुछ इस तरह से तिलमिलाया

की मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया


पहले पहल तो हर किसी ने उसे अपनाया

उसकी बातें सुनकर तारीफों का पुल भी बनाया

पर जब चलने की बात की उसने दिखाई राह पर

सबने उसे भटका हुआ राही बुलाया

बस इसीलिए मैंने एक मंदिर बनाया


सब जानते थे की उसकी पहचान क्या है

सब जानते थे की उसका पैगाम सच्चा है

पर भीड़ के सामने कोई आवाज़ न उठा पाया

इसीलिए मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया

Saturday 20 November 2010

एक और ख्वाब

आज सुबह जब एक ख्वाब से जगा,
और दिन की तरफ धीमे पाँव बढा
तो अचानक अनजाने में ही,
एक और ख्वाब के जाल में उलझ सा गया
और पूरे दिन इसी जाल में जूझता रह गया,
कभी गर्म सूरज को हथेली में क़ैद करना चाहा तो
कभी मोम के पंख लगाकर उड़ने की कोशिश की
और थक कर रात को एक और ख्वाब में खो गया

किसी एक पल में जब आज हकीकत में बैठा
तो पाया कि ज़िन्दगी बस दो तरह के ख्वाबों के बीच,
सिमट कर रह गयी है, और
आखें इतनी नींद में रहती है आजकल कि
इन्हें ख्वाबों के सिवा कुछ नज़र ही नहीं आता !!

Friday 17 September 2010

गीत की तलाश

अपने खाली से मन को भरने के लिए,
इस भारी से लम्हे का बोझ कुछ कम करने के लिए
मैं एक गीत की तलाश में कहाँ कहाँ न गया ...

कुछ अतीत की गलियाँ छानी,
जहाँ बस बीते यादों की धूल मिली
कुछ सपनो की बुनी कहानी,
जो किसी मरीचिका सी दूर रही
कभी प्रीत की डोर भी थामी
पर वो भी कुछ कमज़ोर रही
मंदिर देखे, किताबें ढूंढी,
पर निशाँ न था उसका कहीं

जब एक दिन थक हार कर बैठा
और अपने उसी खाली से मन को देखा
तो उसकी ही गहराइयों में कहीं
इसी लम्हे की गोद में बस वहीं
हर खालीपन को भरता हुआ
हर बोझ को कम करता हुआ
हर नज़र से अनदेखा हुआ
वो गीत हमेशा यहीं था
वो गीत हमेशा यहीं था ...

Friday 30 July 2010

खामोशियाँ

लहरों की तल्ह्टों में कहीं दबी हुयी सी

तूफानों के शोर में कहीं घुली हुयी सी

दुनिया की भाग दौड़ में कहीं मिली हुयी सी

खामोशियाँ गूंजने लगी हैं आजकल कुछ इस तरह

की अपनी आवाजें सुनना मुश्किल सा होने लगा है,


अँधेरे कोनों से पुकारती हुयी सी

गर्म सी साँसों को कंपाती हुयी सी

ठहरे ख्यालों को हिलाती हुयी सी

खामोशियाँ मचलने लगी हैं आजकल कुछ इस तरह

की अब भी कुछ कहना नामुमकिन सा हो गया है...

Sunday 27 June 2010

दूरी


कोई साथ न होकर भी मेरे साथ-साथ चलता है,

जैसे कोई सितारा मुसाफिर के संग सारी रात चलता है

ढूंढ नहीं पाता मैं उसे दिन के उजाले में कहीं

पर हर रात वो यहीं मेरे ख्वाबों में रहता है

दूरियों का यकीन करूँ भी मैं क्यूँकर,

जब बन कर वो मुस्कान सदा इन होंठों पर रहता है...

Sunday 6 June 2010

तुम कह दो

बाहों में भले ही वो,
कितने तूफ़ान समेटे हो
उम्मीद की कश्ती को,
चाहे कितनी ही बार बिखेरे हो
तुम कह दो तो ये सागर अपार नहीं लगता
तूफानों से लड़ना यूँ बेकार नहीं लगता

सपनो से भी मेरे वो,
कितनी ही दूरी पर बैठा हो
छू लेने की कोशिश पर,
"नादान" कह के हँस देता हो
पर तुम कह दो तो क्षितिज पहुँच के पार नहीं लगता
सपनो का पीछा करना भी बिन सार नहीं लगता

कुछ तो जादू- मंतर है तुम्हारे इस विश्वास में
कि इस से बढ़कर तो ये संसार नहीं लगता
हालातों का मुझपर कुछ अख्तियार नहीं लगता
बस तुम कह दो तो ...

Wednesday 28 April 2010

काश

काश की कोई जगह ऐसी भी होती

जहाँ मैं बस मैं और तुम बस तुम होते,

बीच में अनकहे लफ़्ज़ों के फ़ासले,

बेचैन सी खामोशियाँ,

और फ़िज़ूल की बातें न होती



यादें आखों से पिघल कर

आहिस्ता आहिस्ता बह जाती

और सपनो के धुंध

उस पल की रौशनी में

खुद को खो देते


काश की कोई जगह ऐसी भी होती

जहाँ मैं बस मैं और तुम बस तुम होते

और बस उस पल में वक़्त और दूरियों के फ़ासले खोते...

Wednesday 14 April 2010

जाने से पहले

बिछड़ने में ही " चाहत क्या है ",
ये समझाने की ताक़त है
कभी समझे नहीं हम प्यार क्या है
फिर भी बस यूँ ही
गुज़र जाने से पहले मुड़ के उनको
देख लेने की हसरत है ...

Wednesday 24 March 2010

ख्वाब

तुम्हारी आवाज़ सुनकर लगता है ऐसे
लम्बे-अँधेरे सफ़र में दूर कहीं,
दिख गया हो कोई दीप जैसे

एक मुलाक़ात से महसूस होता है ऐसे
मेरे ही सपनो की गलियों में कहीं,
कोई मंजिल की राह दिखा गया हो जैसे

कभी कोई ख़याल तुम्हारा दिल को छू जाता है ऐसे
मेरी उम्मीदों के क्षितिज पर कहीं,
मिल गए हों ज़मीन और आसमान जैसे

इन सबके बाद भी अक्सर बस इस सोच में रहता हूँ
"कहीं तुम खुद कोई ख्वाब तो नहीं ?"
ये दिल मुझसे, मैं दिल से अक्सर कहता हूँ