Sep 19, 2009

आज़ादी


तुमने हमेशा लम्हों को यादों की ज़ंजीरों से बांधना चाहा
हर सपने को हकीक़त की सीमाओं में क़ैद किया
खूबसूरती को तस्वीरों में छुपाने की कोशिशें की
और अपने इर्द-गिर्द अपनी ही चाहत का किला बनाया,
और आज तुम आज़ादी की बात करते हो?
ये बिन जाने,
कि जिन बन्धनों में बाँध रहे हो तुम
ख़ुद उनमें उलझते से जा रहे हो ...

2 comments:

  1. बिन जाने,
    कि जिन बन्धनों में बाँध रहे हो तुम
    ख़ुद उनमें उलझते से जा रहे हो ...

    aah !

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  2. वाह!
    बहुत अच्छा है.

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