Feb 2, 2011

तब मंदिर बने

एक दिन यूँ ही भावनाओं में बहकर मैं

उसको वहां से अपने साथ ले आया

सोचा था बस जाएगा वो भी साथ हमारे

जैसे कितने ही रिवाजों ने है घर बनाया

पर देखकर इस दुनिया की दुनियादारी

वो कुछ इस तरह से तिलमिलाया

की मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया


पहले पहल तो हर किसी ने उसे अपनाया

उसकी बातें सुनकर तारीफों का पुल भी बनाया

पर जब चलने की बात की उसने दिखाई राह पर

सबने उसे भटका हुआ राही बुलाया

बस इसीलिए मैंने एक मंदिर बनाया


सब जानते थे की उसकी पहचान क्या है

सब जानते थे की उसका पैगाम सच्चा है

पर भीड़ के सामने कोई आवाज़ न उठा पाया

इसीलिए मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया

Nov 20, 2010

एक और ख्वाब

आज सुबह जब एक ख्वाब से जगा,
और दिन की तरफ धीमे पाँव बढा
तो अचानक अनजाने में ही,
एक और ख्वाब के जाल में उलझ सा गया
और पूरे दिन इसी जाल में जूझता रह गया,
कभी गर्म सूरज को हथेली में क़ैद करना चाहा तो
कभी मोम के पंख लगाकर उड़ने की कोशिश की
और थक कर रात को एक और ख्वाब में खो गया

किसी एक पल में जब आज हकीकत में बैठा
तो पाया कि ज़िन्दगी बस दो तरह के ख्वाबों के बीच,
सिमट कर रह गयी है, और
आखें इतनी नींद में रहती है आजकल कि
इन्हें ख्वाबों के सिवा कुछ नज़र ही नहीं आता !!

Sep 17, 2010

गीत की तलाश

अपने खाली से मन को भरने के लिए,
इस भारी से लम्हे का बोझ कुछ कम करने के लिए
मैं एक गीत की तलाश में कहाँ कहाँ न गया ...

कुछ अतीत की गलियाँ छानी,
जहाँ बस बीते यादों की धूल मिली
कुछ सपनो की बुनी कहानी,
जो किसी मरीचिका सी दूर रही
कभी प्रीत की डोर भी थामी
पर वो भी कुछ कमज़ोर रही
मंदिर देखे, किताबें ढूंढी,
पर निशाँ न था उसका कहीं

जब एक दिन थक हार कर बैठा
और अपने उसी खाली से मन को देखा
तो उसकी ही गहराइयों में कहीं
इसी लम्हे की गोद में बस वहीं
हर खालीपन को भरता हुआ
हर बोझ को कम करता हुआ
हर नज़र से अनदेखा हुआ
वो गीत हमेशा यहीं था
वो गीत हमेशा यहीं था ...

Jul 30, 2010

खामोशियाँ

लहरों की तल्ह्टों में कहीं दबी हुयी सी

तूफानों के शोर में कहीं घुली हुयी सी

दुनिया की भाग दौड़ में कहीं मिली हुयी सी

खामोशियाँ गूंजने लगी हैं आजकल कुछ इस तरह

की अपनी आवाजें सुनना मुश्किल सा होने लगा है,


अँधेरे कोनों से पुकारती हुयी सी

गर्म सी साँसों को कंपाती हुयी सी

ठहरे ख्यालों को हिलाती हुयी सी

खामोशियाँ मचलने लगी हैं आजकल कुछ इस तरह

की अब भी कुछ कहना नामुमकिन सा हो गया है...

Jun 27, 2010

दूरी


कोई साथ न होकर भी मेरे साथ-साथ चलता है,

जैसे कोई सितारा मुसाफिर के संग सारी रात चलता है

ढूंढ नहीं पाता मैं उसे दिन के उजाले में कहीं

पर हर रात वो यहीं मेरे ख्वाबों में रहता है

दूरियों का यकीन करूँ भी मैं क्यूँकर,

जब बन कर वो मुस्कान सदा इन होंठों पर रहता है...