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Oct 1, 2012

काश कि ये कलम भी बादलों सी होती,
जो बह जाती खुद-ब-खुद, 
जब दिल भारी हो पड़ता
पर इसकी तकदीर में 
शब्दों की मजबूरियां और 
दुनिया के grammar की शर्म लिखी है,
इसीलिए शायद,
इसके हिस्से की स्याही
आँखों को बहानी पड़ती है अक्सर...

Sep 11, 2012

जंजीरों में कुछ अलग सा सुकून होगा,
जो आज़ादी की चाहत के दर्द को भुला देती हैं
भीड़ में भी कुछ अजीब ही राहत होगी,
जो अपने वुजूद की टीस को छुपा देती है,
मज़हब और मुल्क भी खुदा ने ही बनाये होंगे,
जो इंसान होने के भरम को मिटा देते हैं...