रातों के घंटों में बंटने से एक ज़माना पहले
जब चाँद का तकिया लगाकर
आसमान की काली चादर पर
तारों का बिस्तर सजता था,
तब दादी,
कहानियों के कुछ फूल चुनकर
मेरे पास रख जाती थीं
कुछ राजा-रानी और
राक्षस की जान खुद में समेटे तोते
बहुत देर तक
कमरे की हवाओं में तैरते रहते थे
हर रोज एक नयी सी लगने वाली कहानी
आँखों के परदे पर गुज़र जाती थी
और अपनी दुनिया में मुझे कहीं गुम कर जाती थी
इस बात के एहसास में शायद बरसों लग गए
की हर कहानी का अंत हमेशा मुझे मालूम होता था
राजा रानी से अमूमन मिल ही जाता था
फिर भी जाने क्यूँ
रोज़ इन्हें सुनने में एक नया मज़ा आता था...
शायद तब कहानियों को जीना
अंत तक पहुँचने से ज़्यादा एहमियत रखता था
और शायद इसीलिए जिंदगी के कामों में कहीं
अब वो मज़ा नहीं आता...
(Image source: http://images5.fanpop.com/image/polls/855000/855238_1318607051730_full.jpg)
