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Feb 2, 2011

तब मंदिर बने

एक दिन यूँ ही भावनाओं में बहकर मैं

उसको वहां से अपने साथ ले आया

सोचा था बस जाएगा वो भी साथ हमारे

जैसे कितने ही रिवाजों ने है घर बनाया

पर देखकर इस दुनिया की दुनियादारी

वो कुछ इस तरह से तिलमिलाया

की मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया


पहले पहल तो हर किसी ने उसे अपनाया

उसकी बातें सुनकर तारीफों का पुल भी बनाया

पर जब चलने की बात की उसने दिखाई राह पर

सबने उसे भटका हुआ राही बुलाया

बस इसीलिए मैंने एक मंदिर बनाया


सब जानते थे की उसकी पहचान क्या है

सब जानते थे की उसका पैगाम सच्चा है

पर भीड़ के सामने कोई आवाज़ न उठा पाया

इसीलिए मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया