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May 13, 2013

क्यों: Some experimental poetry

I am trying to innovate on existing forms of poetry with this post. This is an innovation inspired by the haiku tradition. The presentation of this poem is designed as follows:
  • The expression is in the form of very short phrases leaving the interpretation open to the reader to some extent
  • It begins with two related but seemingly different question
  • Each stanza answers the two questions, in order of their appearance, in a concise way till the point both the questions seem to merge
  • A final conclusion is in the form of a word picture
Please give your feedback and you are also welcome to try your hand at this new game format in comments.

जीना...
लिखना...
क्यों?

अपरिचित क्षमताएँ.
अनदेखे सवाल.

उलझे राज़.
हकीक़त का रोग.

खुद का एहसास.
सपनों की तलाश.

चैन की सांस.
स्वछन्द सोच.

अपरिमित ब्रह्माण्ड.

(Picture Source: http://www.openlounge.org/lunargame/files/2011/11/question-blue.jpg)

Feb 9, 2013

शायरी

एक ठहरे हुए पल में रुक नहीं पाती है जो,
और बेचैन सी ढूंढती रहती है मायने
कभी पुरानी डायरी के पन्नों में,
और कभी कैलेंडर कि अगली तारीखों में
ये शायरी भी जिंदगी जैसा ही रोग है,
जो कभी मुकम्मल तो नहीं होती
पर पूरी ज़रूर होती रहती है...

Sep 18, 2012

Compilation of random lines

1. कितने भी करीने से सजा लो ज़हन की दुनिया,
    उसकी आँखों की फ़कत दो बूंदें सब उलझा देती हैं...
    (#Delhi Rains)

2. किस किस को अपनी बर्बादियों का ज़िम्मा दूँ,
    कुछ माहौल खराब थे कहीं
    कुछ मैं भी बुरा हूँ ....

3. फुर्सत है होती तब उलझ जाता हूँ अपनी जिंदगी में मैं
    पर जब जिंदगी फुर्सत नहीं देती तो चाँद बहुत प्यारा लगता है...

4. जब आखिरी बार मुड कर देखा तो कमरा खाली था
    पर क्या छोड़ जा रहा हूँ यहाँ इसका कुछ हिसाब नहीं बनता...
    (last update from XL)

5. पेड़ की टहनियों में उलझ कर चाँद, आज मेरी खिडकी के पास ही रुक गया
    मैं ये समझा की मेरी ही तरह वो भी, अपनी राह से भटक गया...

Oct 2, 2011

बस कुछ यूँ ही

चाँद बनने की तमन्ना भी रखते हैं
और धब्बों से परहेज़ भी करते हैं
आसमान छूने की ख्वाहिश भी रखते हैं
और आँखों में सूरज का खौफ़ भी करते हैं
कुछ अजीब ही हैं तेरे शहर के लोग, ए यार
शोर को इज़हार समझते हैं और,
ख़ामोशी नज़रअंदाज़ करते हैं...

Apr 8, 2011

सफ़र और मंजिल

बहुत दूर आ चुका है अब इंसान
हैरत है होती अब कि मंज़िल कहाँ थी

चाँद पर कदम जमाये तो एक अर्सा गुज़र गया
ख्याल भी नहीं अब कि ज़मीन कहाँ थी

अपने हालातों को मजबूरियों का नाम दे दिया
याद नहीं आता है अब कि चाहत क्या थी

मुल्क और मज़हब का नुमा इन्दा बना है हर शख्स
इन लोगों की भीड़ में इंसानियत कहाँ थी

काश की कभी रुक कर सफ़र पर सोचा होता
पर इस अंधी दौड़ में इतनी सी भी फुर्सत कहाँ थी