May 3, 2013

मिट्टी



सुना था कभी कि इंसान मिट्टी से बना है
इसीलिए शायद इसे मिट्टी से इतना लगाव है
कि आसमां के फैलाव की बजाय
ये मिट्टी की लकीरों में अपनी पहचान ढूँढता है
और रहता है तैयार मिट्टी में मिलाने को
उन सबको जो इसकी मिट्टी के दायरे के उस पार रहते हैं
सचमुच इंसान मिट्टी का ही बना होगा
वर्ना एक धड़कता दिल इतना बेपरवाह कैसे हो सकता है

(Photo Source: http://www.flickr.com/photos/danhacker/4305416079/lightbox/)

18 comments:

  1. सचमुच इंसान मिट्टी का ही बना होगा
    वर्ना एक धड़कता दिल इतना बेपरवाह कैसे हो सकता है

    ...बहुत सुन्दर और सार्थक रचना...

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    1. प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद सर!

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  2. I like the last couple of lines the most...

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    1. thnx! personally, on a re-read, i like the lines where we identify ourselves with lines on the earth instead of the vastness of the sky :)

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  3. अभिजीत जी बिल्कुल सही कहा । संयोग है कि मेरी कविता में भी लगभग ऐसे ही भाव हैं ।

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    1. हमारे आस पास की समस्याएँ दिखने में तो कई हैं पर इनकी जड़ें कुछ गिनी चुनी हैं. जब थोड़ी सी सोच की कुल्हाड़ी चलाइए तो अमूमन एक ही जड़ से जा टकराती है...

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  4. जड़ें मिट्टी में होती हैं न.....
    उनसे विलग कैसे हुआ जाय भला???

    सुन्दर अभिव्यक्ति
    अनु

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    1. ये माना की जड़ें मिट्टी में होती हैं, पर इसका मतलब ये नहीं की जिस मिट्टी में मेरी जड़ें हैं मेरे लिए सिर्फ वही मिट्टी महत्त्व रखे. अगर मिट्टी से जुडना है तो उसको बांटकर देखना कहाँ तक सही है...

      प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया.

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  5. पूरी रचना बहुत ही खूब.कुछ भी छोड़ दूं तो नाइंसाफी होगी.

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  6. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी.....!!!

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

    संजय भास्‍कर
    शब्दों की मुस्कुराहट
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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