Oct 2, 2011
बस कुछ यूँ ही
और धब्बों से परहेज़ भी करते हैं
आसमान छूने की ख्वाहिश भी रखते हैं
और आँखों में सूरज का खौफ़ भी करते हैं
कुछ अजीब ही हैं तेरे शहर के लोग, ए यार
शोर को इज़हार समझते हैं और,
ख़ामोशी नज़रअंदाज़ करते हैं...
May 7, 2011
The days
ओस की एक बूँद एक रात अनजाने में एक पत्ते से मिल गयी
और जिसको पड़ाव समझा था वो शेह ज़िन्दगी सी बन गयी
अब तो ये भी होश नहीं की उस मोड़ के बाद ज़िन्दगी किधर गयी
एक गीत , एक हंसी और कुछ धुआं बनकर शायद हवाओं में बिखर गयी
ए दोस्त तेरे साथ , और उसकी एक हंसी से लगा सारी उलझने सुलझ गयी
चल पड़ा था जिनपर यूँ ही , वो र|हें मंजिल सी बन गयी
पर अब ये सफ़र ख़त्म होने को है
राह का मुसाफिर अपनी मंजिल पाने को है
पर जो बातें यादें बनकर इन लम्हों में गुज़र गयीं
शायद वही जीने के एहसास को पूरा कर गयीं
Apr 24, 2011
तेरा सपना
Apr 8, 2011
सफ़र और मंजिल
बहुत दूर आ चुका है अब इंसान
हैरत है होती अब कि मंज़िल कहाँ थी
चाँद पर कदम जमाये तो एक अर्सा गुज़र गया
ख्याल भी नहीं अब कि ज़मीन कहाँ थी
अपने हालातों को मजबूरियों का नाम दे दिया
याद नहीं आता है अब कि चाहत क्या थी
मुल्क और मज़हब का नुमा इन्दा बना है हर शख्स
इन लोगों की भीड़ में इंसानियत कहाँ थी
काश की कभी रुक कर सफ़र पर सोचा होता
पर इस अंधी दौड़ में इतनी सी भी फुर्सत कहाँ थी
Feb 2, 2011
तब मंदिर बने
एक दिन यूँ ही भावनाओं में बहकर मैं
उसको वहां से अपने साथ ले आया
सोचा था बस जाएगा वो भी साथ हमारे
जैसे कितने ही रिवाजों ने है घर बनाया
पर देखकर इस दुनिया की दुनियादारी
वो कुछ इस तरह से तिलमिलाया
की मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया
पहले पहल तो हर किसी ने उसे अपनाया
उसकी बातें सुनकर तारीफों का पुल भी बनाया
पर जब चलने की बात की उसने दिखाई राह पर
सबने उसे भटका हुआ राही बुलाया
बस इसीलिए मैंने एक मंदिर बनाया
सब जानते थे की उसकी पहचान क्या है
सब जानते थे की उसका पैगाम सच्चा है
पर भीड़ के सामने कोई आवाज़ न उठा पाया
इसीलिए मैं भगवान् को मंदिर में छोड़ आया