Sep 19, 2009

आज़ादी


तुमने हमेशा लम्हों को यादों की ज़ंजीरों से बांधना चाहा
हर सपने को हकीक़त की सीमाओं में क़ैद किया
खूबसूरती को तस्वीरों में छुपाने की कोशिशें की
और अपने इर्द-गिर्द अपनी ही चाहत का किला बनाया,
और आज तुम आज़ादी की बात करते हो?
ये बिन जाने,
कि जिन बन्धनों में बाँध रहे हो तुम
ख़ुद उनमें उलझते से जा रहे हो ...

Sep 3, 2009

एक सवाल


ऐसा क्यों होता है कभी कभी कि

बातें शब्दों के जाल में उलझकर रह जाती हैं,

इरादे कोशिश के दायरे से निकल कर हकीकत को नही छू पाते हैं

सुबहें पलकों के परदों को पार कर आंखों से नही मिलती,

और आवाजें इन कानों को चीर कर दिल तक नही पहुँचती

क्यों हम खुली आंखों से सच को झुठलाते हैं और,

अपनी हालत का जिम्मेदार हालात को ठहराते हैं?



Jul 9, 2009

उड़ान

आज बंद करके आँखें,
जो आकाश को देखा
तो कितने ही आज़ाद पंछी दिखे
उड़ते हुए एक ऐसी उड़ान,
जिसका न कोई अंत था और न कोई शुरुआत,
न कोई क़दमों के निशाँ थे आसमान पर,
जिनपर उनको चलना पड़ता
न थी उम्मीद की बेडियाँ,
जो बांधती हो उनको लोगों के सपनों से

बस आज़ादी थी और,
उनकी अपनी उड़ान
जो कहीं से मुझे कुछ इशारा सा करती थी

पर जब आँख खुली,
तो शाम ढल चुकी थी
और आसमान खाली था
मैं वहीँ ज़मीन पर,
अपने परों से अनजान
भीड़ में खोता जा रहा था ...

Jun 25, 2009

मुड़ कर न देखना


वक़्त के इशारे पे,

नदी के इस किनारे से,

रुख़सत तो पड़ रहा है तुम्हे करना

बस इतनी सी गुज़ारिश है मेरे दोस्त

इस तरफ़ मुड़ कर न देखना


जाते हुए क़दमों की आहट को मैं सुन लूँगा

चुप चाप शायद रो भी लूँ,

पर कुछ न कहूँगा

पर अपनी आंखों में आए तूफ़ान से,

मेरे सब्र के बाँध की ताक़त को न परखना

बस इसीलिए गुज़ारिश है मेरे दोस्त

अब कभी मुड़ कर न देखना

Jun 17, 2009

Love (continued from earlier post)

अधखुली आंखों में एक मोती सजा कर रखा है,
यादों के धागे में एक लम्हा पिरो कर रखा है,
अब इस से ज़्यादा हासिल क्या होगा ज़िन्दगी में ,
चाहा था जिसे उसको इस दिल में छुपा कर रखा है .