Mar 5, 2014

वो आँखें

जहाँ के कम-रोशन चेहरों की भीड़ में
खुलते हैं दो चमकते दरीचे नूर के,
जब कभी वो मुस्कुरा देते हैं
वो दो आँखें कुछ ऐसी लगती हैं जैसे,
सुबह की धूप में चमक रहीं हों
ओस की बूंदें पत्तों पर
वो ओस की बूंदें,
जिनकी उम्र भले ही एक पल ही क्यूँ न हों
पर उन्हें देखने की खातिर
सूरज सदियों से ज़मीन के फेरे लगा रहा है
बस इस उम्मीद में कि एक दिन
उस से आ मिलेंगी ये चाहत के बादलों पर सवार होकर...
इश्क नहीं तो बस उनकी आरज़ू किये जा,
वो जो दूर हैं बस उनकी जुस्तजू किये जा,
क्या हुआ जो मिलते नहीं कभी दिन और रात,
इस शाम के वहम में ही एक ज़िंदगी जिए जा...

लफ़्ज़ों का शोर

आज रात के दामन में हसीं ख्वाब कुछ ज़्यादा ही थे,
इतने ज़्यादा की आँखों में उन्हें समा लेने पर,
पलकों से छलक जाने का डर महसूस होता था
इसीलिए जागता रहा मैं रात भर...
उन ख्वाबों को खुली आँखों के सामने लेकर,
न वो कुछ बोलते थे और न मैं कुछ कहता था
पर दोनों एक दूसरे के हालात खूब समझते थे

इस खूबसूरत खामोश लम्हे को
जब मैंने लफ़्ज़ों में क़ैद करने की कोशिश की
तब रात की ख़ामोशी में अल्फाजों की ज़हर घुल गयी
और वो पूरी सी दिखती नज़्म अधूरी रह गयी...

Happy Republic Day

समय के दो सुनहरे किनारों को जोड़ने वाले,
आज के नाज़ुक से पुल पर
धीमी रफ़्तार से चलता हुआ,
ज़माने की हवाओं से कभी
लडखडाता, कभी संभलता हुआ
कन्धों पर ख्यालों से भरे बस्ते का वज़न उठता,
घुटनों पर लगी चोटों को समझकर कदम बढाता
एक बच्चा दिखता है मुझे
दुनिया में अपनी राह बनाता,

इस छोटी सी उम्र में ही माथे पर
तजुर्बे की लकीरें नज़र पड़ती हैं,
कहीं कहीं अपनों की दी हुयी चोटों से
चेहरे पर शिकन भी दिखती है
पर हर अफ़सोस भूलकर मुस्कुरा देता है वो
बस एक बार जो कोई उसे अपना भारत कहकर पुकार दे .

एक शाम

Based on the memory of the setting sun across the Mandvi river in Goa.

इस किनारे पर बैठे हुए,
हर गुज़रती हुयी कश्ती के साथ
नज़रों से मैं दूसरे किनारे को छू आता था

वो दूसरा किनारा जहाँ की दलदली ज़मीन में
सूरज फंसता और डूबता जा रहा था
उसने आवाज़ तो लगायी होगी मदद की,
पर जलने के डर से किसी ने हाथ न बढ़ाया होगा
या फिर अपनी ही आग से डर कर
उसने ही किसी को नहीं बुलाया होगा...

कुछ भी हो,
वो धीरे धीरे डूबता गया और नदी बुझती गयी
और हर रोज़ की तरह
शाम अपना तमाशा पूरा कर
रात के परदे के पीछे जा बैठी.