Mar 5, 2014

कभी कभी दिल फ़कत इस फिराक से तेरी आवाज़ सुनना चाहता है कि
यकीन आ जाए कि मैं हूँ कहीं,
तेरे जहाँ में न सही
तो तेरे ख्यालों में ही कहीं,
तेरे वादों में न सही
तो तेरे गुज़ारे इरादों में ही कहीं,
आज अपने वुजूद पर कुछ शक सा हो रहा है
एक बार नाम ले लो मेरा,
कि खुद पर यकीन आ जाए...

इंकलाब

मेरे कमरे में एक कोना ऐसा भी है
जहाँ सूरज की रौशनी नहीं आती,
और दीवारें सीलन से कुछ नम पड़ी हुयी हैं,
ऐसा लगता है कभी अँधेरे में चुप चाप रोयी हों...

उसी कोने में रखी एक बंद अलमारी में,
पड़ी हैं कुछ पुरानी किताबें और डायरियाँ
जिनमें क़ैद हैं सैकड़ों इन्क़लाब,
जो उबलते खून की लहरों से पैदा होकर
कागज़ के किनारों से टकरा कर खो गए,
जिनके सवाल,
आदतन हाँ या ना कहने वाली भीड़
के कानों में पड़कर कहीं गुम हो गए,
या लोगों के 'पर्सनल लाजिक' की बेसिरपैर की जंजीरों में
उनका दम घुट गया था
और कभी कभी अपनी ही सूरत से शर्माने वाले 'टीनेजर'
की तरह आईने के सामने न आ सके...

आज जब कुछ लोगों को किसी फोरम पर
बदलाव की बातें करते देखा
तो जाने क्यूँ
वही कोना याद आ गया...

मुसाफिर

अपने ज़हन के झोले में जाने किस तरकीब से
इरादों की इमारतें रखकर चलता हूँ
कुछ एक ख्याल के रास्ते भी हैं
जो इसमें यूँ ही फिट हो जाते हैं
और ले आता हूँ साथ तुम्हे भी,
यादों की गठरी में बांधकर,
बस कहने को ये मुंबई है और वो दिल्ली थी,
पर अपने शहर तो मैं साथ लिए फिरता हूँ...

Jan 9, 2014

Musings on a visit to the Red Fort in Delhi

जाने क्यूँ कहते हैं ये कि समय दिखता नहीं,
आज मैंने उसे इन दीवारों पर देखा है...
रिसते हुए पानी की बूंदों में,
खोखली होती कुछ बुनियादों में,
मिटते हुए कुछ निशानों में,
बदलती हुयी कुछ सल्तनतों में,
बिखरती हुयी कुछ तस्वीरों में,
और इनके सामने उम्मीद और खुशी ली हुयी कुछ और तस्वीरों में,

कौन कहता है कि समय दिखता नहीं,
इसके कदमों के निशाँ हर सीने की दीवार पर चस्पाँ हैं |

Dec 12, 2013

रंग

आज सुबह आसमान का रंग सुर्ख लाल था
जैसे तुम्हारे हाथों से
होली के कुछ रंग छलक गए हों
सारा दिन कमबख्त जिंदगी की धूप ने
इस रंग को उड़ाना चाहा
ये हल्का तो हुआ
पर कभी पूरी तरह मिट न सका
और रात को अँधेरे कि चादर ओढकर दिन सो गया
तुम्हारे रंगों को सीने में छुपाये
जो एक नयी सुबह फिर इसके साथ जी उठेंगे...