Mar 5, 2014

मुसाफिर

अपने ज़हन के झोले में जाने किस तरकीब से
इरादों की इमारतें रखकर चलता हूँ
कुछ एक ख्याल के रास्ते भी हैं
जो इसमें यूँ ही फिट हो जाते हैं
और ले आता हूँ साथ तुम्हे भी,
यादों की गठरी में बांधकर,
बस कहने को ये मुंबई है और वो दिल्ली थी,
पर अपने शहर तो मैं साथ लिए फिरता हूँ...

Jan 9, 2014

Musings on a visit to the Red Fort in Delhi

जाने क्यूँ कहते हैं ये कि समय दिखता नहीं,
आज मैंने उसे इन दीवारों पर देखा है...
रिसते हुए पानी की बूंदों में,
खोखली होती कुछ बुनियादों में,
मिटते हुए कुछ निशानों में,
बदलती हुयी कुछ सल्तनतों में,
बिखरती हुयी कुछ तस्वीरों में,
और इनके सामने उम्मीद और खुशी ली हुयी कुछ और तस्वीरों में,

कौन कहता है कि समय दिखता नहीं,
इसके कदमों के निशाँ हर सीने की दीवार पर चस्पाँ हैं |

Dec 12, 2013

रंग

आज सुबह आसमान का रंग सुर्ख लाल था
जैसे तुम्हारे हाथों से
होली के कुछ रंग छलक गए हों
सारा दिन कमबख्त जिंदगी की धूप ने
इस रंग को उड़ाना चाहा
ये हल्का तो हुआ
पर कभी पूरी तरह मिट न सका
और रात को अँधेरे कि चादर ओढकर दिन सो गया
तुम्हारे रंगों को सीने में छुपाये
जो एक नयी सुबह फिर इसके साथ जी उठेंगे... 

Jun 10, 2013

You've reached a dead blog!!

Whatever source may have guided you here, I am sorry to inform you that this is a dead blog. If you were a regular reader or visited this page anytime before, then I would like to thank you for your support. For all those who commented on my posts, I thank you and I got to learn quite a few things from you.

The older posts are available in the archive on the right. Feel free to glance/read/use it in any way you may find them useful.

Goodbye for now!

Jun 3, 2013

दादी की कहानियाँ


रातों के घंटों में बंटने से एक ज़माना पहले
जब चाँद का तकिया लगाकर
आसमान की काली चादर पर
तारों का बिस्तर सजता था,
तब दादी,
कहानियों के कुछ फूल चुनकर
मेरे पास रख जाती थीं

कुछ राजा-रानी और
राक्षस की जान खुद में समेटे तोते
बहुत देर तक
कमरे की हवाओं में तैरते रहते थे
हर रोज एक नयी सी लगने वाली कहानी
आँखों के परदे पर गुज़र जाती थी
और अपनी दुनिया में मुझे कहीं गुम कर जाती थी

इस बात के एहसास में शायद बरसों लग गए
की हर कहानी का अंत हमेशा मुझे मालूम होता था
राजा रानी से अमूमन मिल ही जाता था
फिर भी जाने क्यूँ
रोज़ इन्हें सुनने में एक नया मज़ा आता था...

शायद तब कहानियों को जीना
अंत तक पहुँचने से ज़्यादा एहमियत रखता था
और शायद इसीलिए जिंदगी के कामों में कहीं
अब वो मज़ा नहीं आता...

(Image source: http://images5.fanpop.com/image/polls/855000/855238_1318607051730_full.jpg)