Jul 16, 2012

यादों का जिन्न


एक अलसाई सी शाम को
यादों के एक चिराग पर उंगलियां जो घुमायीं तो
तो एक बीते ज़माने का जिन्न निकल आया
और पूछ बैठा कि क्या हुक्म है मेरे आका?

"कहो तो ले जाऊं एक ऐसी दुनिया में जहाँ फिक्र का नाम न हो
और रातों को हँसते खेलते सुबहों से मिलने के सिवा कुछ काम न हो
जहाँ घंटे पलों में और बरस दिनों में सिमट जाएँ
और अंत में रह जाए बस एक लम्हे कि पूरी जिंदगी"

"या ले चलूँ उस गंगा के शहर में जहाँ सब अपने से लगते थे
या मिलवा दूँ उस शख्स से एक बार फिर
जिसकी आँखों में हज़ारों सपने से रहते थे "

कुछ हैरान सा था ये देखकर मैं
कि आज भी वो दिन इस चिराग में क़ैद हैं
और अब भी ये बंधन एक पल में कैसे
मुझे आज़ाद कर जाते हैं

फिर ये सोचकर उस चिराग को दिल के किसी कोने में रख दिया
कि किसी अँधेरी रात को शायद फिर काम आ जाएगा...


Feb 22, 2012

तस्वीरें

Almost two amazing years at XL are about to end. Saw the Learning Center in the evening today and was reminded of a pic of the same in the admissions brochure. This poem is dedicated to the awesome place called XLRI.

मैं तुम्हे कभी बस तस्वीरों से जानता था
देखता था तुमको और तुम्हारे रंगों पर आश्चर्य करता था
कि क्या हकीकत तस्वीरों के सपनों जैसी हो सकती है?

फिर एक दिन तुम हकीकत बन गए
और तुमसे मिलकर जाना कि तस्वीरें कितनी अधूरी हैं
उजाले और अंधेरों के कितने रंग हैं
जो इनमें समा ही नहीं सकते

और अब मुझे खुद से मिलाकर
थोड़ा सा जिंदगी का एहसास कराकर तुम
फिर उन्ही तस्वीरों में गुम होने वाले हो
तस्वीरों से तस्वीरों तक का सफर भी कितना खूबसूरत और अजीब होता है...

Dec 3, 2011

तुम कौन हो ?

बाहें फैलाए मिलने वाले सूरज के जैसे,
मेरे दिन रोशन कर जाया करते थे
अब ढलती शाम के ओझल होते दिन के जैसे
थोडा सा अँधेरा इस कमरे में भर जाते हो

दौड से हांफती इस जिंदगी में साँसों के जैसे
मेरे सीने में भर जाया करते थे
अब टूटते जिस्म की आखिरी श्वासों के जैसे
थोडा सा मुझे अकेला कर जाते हो

महफ़िल में गूंजने वाले बोलों के जैसे
मेरे होंठों पर सज जाया करते थे
अब किसी भूले हुए गीत के लफ़्ज़ों के जैसे
थोडा सा यादों से खोते जाते हो

अब मैं क्या कहूँ तुमसे की तुम कौन हो
कल तुम मेरे गीत थे
अब तुम मेरे मौन हो ..

Oct 2, 2011

बस कुछ यूँ ही

चाँद बनने की तमन्ना भी रखते हैं
और धब्बों से परहेज़ भी करते हैं
आसमान छूने की ख्वाहिश भी रखते हैं
और आँखों में सूरज का खौफ़ भी करते हैं
कुछ अजीब ही हैं तेरे शहर के लोग, ए यार
शोर को इज़हार समझते हैं और,
ख़ामोशी नज़रअंदाज़ करते हैं...

May 7, 2011

The days

Written for the climax of a short film on college life.

ओस की एक बूँद एक रात अनजाने में एक पत्ते से मिल गयी
और जिसको पड़ाव समझा था वो शेह ज़िन्दगी सी बन गयी
अब तो ये भी होश नहीं की उस मोड़ के बाद ज़िन्दगी किधर गयी
एक गीत , एक हंसी और कुछ धुआं बनकर शायद हवाओं में बिखर गयी
ए दोस्त तेरे साथ , और उसकी एक हंसी से लगा सारी उलझने सुलझ गयी
चल पड़ा था जिनपर यूँ ही , वो र|हें मंजिल सी बन गयी
पर अब ये सफ़र ख़त्म होने को है
राह का मुसाफिर अपनी मंजिल पाने को है
पर जो बातें यादें बनकर इन लम्हों में गुज़र गयीं
शायद वही जीने के एहसास को पूरा कर गयीं